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Taj Mahal History in Hindi | ताजमहल का इतिहास

Taj Mahal History in Hindi : ताजमहल अब तक के सर्वश्रेष्ठ मकबरों में से एक है। यह आगरा (उत्तर प्रदेश) में स्थित हाथी दांत-सफेद संगमरमर से बना एक स्मारक है। इसने कई बार विश्व के सात अजूबों में एक जगह बनाकर भारत को...

Taj Mahal History in Hindi : ताजमहल अब तक के सर्वश्रेष्ठ मकबरों में से एक है। यह आगरा (उत्तर प्रदेश) में स्थित हाथी दांत-सफेद संगमरमर से बना एक स्मारक है। इसने कई बार विश्व के सात अजूबों में एक जगह बनाकर भारत को गौरवान्वित किया है। इसकी सुंदरता और महिमा से लाखों पर्यटक आकर्षित होते हैं। ताजमहल इतिहास की अपनी प्रेरणा और निर्माण के पीछे अपनी एक दिलचस्प कहानी है।

Taj Mahal Story in Hindi – ताजमहल का इतिहास

सोलहवीं शताब्दी में, इस मकबरे का निर्माण मुग़ल बादशाह शाहजहाँ (मुग़ल सम्राट जहाँगीर का पुत्र) ने अपनी पत्नी मुमताज़ महल के निधन के बाद उन्हें श्रद्धांजलि के रूप में करवाया था।

शाहजहाँ ने 14 साल की उम्र में एक फ़ारसी राजकुमारी, मुमताज़ महल से शादी की। उनकी कई पत्नियां थीं, लेकिन मुमताज के साथ उन्हें बहुत प्यार था। मुमताज अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाती थीं।

मुमताज महल:

मुमताज महल एक फ़ारसी राजकुमारी थी। वह अब्दुल हसन आसफ खान की बेटी थी। वह 1593 में आगरा में पैदा हुई थी और भविष्य के युवा मुगल सम्राट से मिली, जबकि वह अभी भी राजकुमार खुर्रम था। खुर्रम ने इसकी सुंदरता के जादू से मोहित हो गया था और उसने 1607 में उससे सगाई कर ली थी.

शादी को 5 साल बाद 1612 में मनाया गया था। वहाँ से एक सबसे बड़ी प्रेम कहानी शुरू हुई जिसे हम जानते हैं, हालाँकि वह शाहजहाँ की तीन पत्नियों में से एक थी (पहले से दो बार विवाहित थी), वह उसकी पसंदीदा थी। यहां तक ​​कि उन्होंने उसे मुमताज महल नाम दिया, जिसका अर्थ है “महल का गहना”। इनका असली नाम मर्जुमंद बानू बेगम था.

अपने पूरे जीवन के दौरान मुमताज महल अपने पति के बहुत करीब थीं। वह उसका विश्वसनीय साथी था और उसके साथ पूरे मुगल साम्राज्य में यात्रा की, जो कि दो अन्य पत्नियों, अकबराबादी महल और कंधारी महल के साथ नहीं थी, जिनके साथ सम्राट के सरल, कम भावुक रिश्ते थे। । इसके अलावा, यह माना जाता है कि राजनीतिक शक्ति पर उनका बहुत प्रभाव था, एक अनौपचारिक सलाहकार की भूमिका निभाते हुए, और गुप्त रूप से साम्राज्य के लड़ाकों के युद्ध के समान संघर्ष का आनंद ले रहे थे।

मुमताज महल का निधन:

1630 में मुमताज महल शाहजहाँ के साथ दक्कन के पठार गयी थी जहाँ पर एक सैन्य अभियान चल रहा था। उसे नहीं पता था कि यह उसकी अंतिम यात्रा होगी। 17 जून, 1631 को दुर्भाग्यवश अपने 14 वें बच्चे को जन्म देने के बाद, एक बच्ची (जिसे बाद में जहानारा नाम दिया गया) मुमताज महल का निधन हो गया। और उनकी मृत्यु के समय बुरहानपुर में उन्हें दफनाया गया।

लेकिन यह मकबरा अस्थायी था, यह वही था जो शाहजहाँ ने तय किया था, जिसने दुःख से तबाह होकर अपनी पत्नी को एक मकबरा बनाने के लिए उतने ही सुंदर बनाया जितना कि उसके लिए उसका प्यार था। उन्होंने इस कार्य में 22 साल लगा दिए और आंशिक रूप से मुगलों के खजाने को बर्बाद कर दिया, लेकिन मामला उनकी उम्मीदों पर निर्भर था। तब जाकर ताजमहल का जन्म हुआ था।

Full History of Taj Mahal in Hindi – ताजमहल का इतिहास

शाहजहाँ की अंतिम इच्छा थी कि उनके असीम प्रेम के एक सार के रूप में एक महल बनाया जाए। यह वही साल था जब शाहजहाँ ने अपनी प्यारी पत्नी के लिए स्मारक का निर्माण शुरू किया था। तब आर्किटेक्ट का चुनाव करना जरूरी था। यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई गलती ना हो, शाहजहाँ ने एक नहीं बल्कि 9 निर्माणकर्ताओं को लिया, जिन्होंने साथ काम किया।

Architect of Taj Mahal:

ताजमहल की ली गयी सबसे पहली तस्वीर

About Taj Mahal History in Hindi
About Taj Mahal History in Hindi

इतिहास ने स्मारक के निर्माणकर्ताओं के बारे में अधिक जानकारी नहीं छोड़ी है, लेकिन “उस्ताद अहमद लाहौरी” संभवत: मुख्य वास्तुकार हैं, जो शाहजहाँ के साथ नियमित संपर्क में थे और उनकी इच्छाओं को समझते थे। उस्ताद अहमद लाहौरी थे, जो फारसी मूल के भारतीय थे जिन्हें बाद में दिल्ली में लाल किले को डिजाइन करने का श्रेय दिया गया। निर्माण 1632 के आसपास शुरू हुआ और अगले दो दशकों तक जारी रहा।

भारत, फारस, यूरोप और ओटोमन साम्राज्य के लगभग 1,000 से अधिक हाथियों के साथ 20,000 से अधिक श्रमिकों को ताजमहल का समाधि परिसर बनाने के लिए लाया गया था।

ताजमहल का डिजाइन और निर्माण

मुमताज महल के सम्मान में ताजमहल का नाम रखा गया, मकबरे का निर्माण सफेद संगमरमर की जाली से किया गया था जिसमें कीमती पत्थरों (जेड, क्रिस्टल, लापीस लजुली, नीलम और फ़िरोज़ा) को पिएट्रा ड्यूरा के रूप में जाना जाता है।

इसका केंद्रीय गुंबद 240 फीट (73 मीटर) की ऊंचाई तक पहुंचता है और चारों कोनों पर खड़े मीनारों से घिरा हुआ है। मकबरे में धनुषाकार प्रवेश द्वार पर कुरान से कुछ छंद सुलेख में अंकित किए गए थे।

मकबरे के अंदर, एक अष्टकोणीय संगमरमर का कक्ष नक्काशी और कीमती पत्थरों से सुसज्जित है जो मुमताज महल की नकली कब्र है। उसके वास्तविक अवशेषों वाली असली कब्र, बगीचे के स्तर पर नीचे रखी गई है।

कार्य क्षेत्र और निर्माण स्थल के संगठन के निर्माण के बाद, मुख्य कार्य उत्तरी छत की ऊंचाई और मकबरे के निर्माण थे। शेष परिसर का निर्माण थोड़ी देर बाद हुआ, विशेष रूप से बगीचों और आंतरिक आंगन में।

दक्षिण गेट पर शिलालेख, और विशेष रूप से अब्द-उल-हक के विभिन्न हस्ताक्षर जिन्हें इमारतों में शिलालेख पर उकेरने का काम किया, यह दर्शाता है कि यह दरवाजा समाधि के अंत से पहले शुरू किया गया था और उसके बाद समाप्त हो गया था।

शाहजहाँ का इरादा था कि ताजमहल से यमुना नदी के पार एक दूसरा भव्य मकबरा बनाया जाए, जहाँ मरने पर उसके अपने अवशेष दफन हो जाएँ; दो संरचनाओं को एक पुल से जोड़ा जाना था।

वास्तव में, औरंगज़ेब (मुमताज़ महल के साथ शाहजहाँ के तीसरे बेटे) ने 1658 में अपने बीमार पिता को गिरफ्तार कर लिया और खुद को सत्ता में ले लिया। शाहजहाँ ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष आगरा के किले में घर की गिरफ्तारी के दौरान गुजारे (जहाँ उन्होंने अपनी पत्नी के लिए राजसी विश्राम स्थल बनाए थे); जब वह 1666 में मर गया, तो उसे उसके बगल में दफनाया गया।

ब्रिटिश वर्चस्व – Taj Mahal Information in Hindi

1857 में ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत पर अधिकार कर लिया। यह देश में एक भारतीय विद्रोह का परिणाम था, जिसे उपनिवेशवादी द्वारा कम किया गया था। इस वर्ष के दौरान, ताजमहल मुश्किलों से गुजरता है क्योंकि यह ब्रिटिशों द्वारा स्मारक में दिए गए कीमती पत्थरों को निकालने के लिए खंडित किया गया था। कुछ कीमती पत्थरों का पता लगाया गया है, लेकिन हमें नुकसान और इसकी मरम्मत की सीमा के बारे में बहुत कम जानकारी है।

अंग्रेजों ने अपनी संस्कृतियों के एक हिस्से को मौजूदा परंपराओं और धर्मों की बहुत अधिक परवाह किए बिना राज किया। उन्होंने ताजमहल को कोई स्वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं समझा बल्कि यह उनके लिए केवल दूसरों की तरह एक बगीचा ही था। उन्होंने वही किया जो पहले अकल्पनीय था. उन्होंने स्मारक पर काफी हद तक मरम्मत की।

बाद में लॉर्ड जॉर्ज कर्ज़न ने 1899 से 1905 तक भारत के गवर्नर-जनरल द्वारा पहल की। इस विलक्षण व्यक्ति ने ताजमहल के जीर्णोद्धार कार्यों का निर्देशन किया जो 1908 में उनके जाने के बाद पूरा हुआ।

वे पूरी तरह से व्यवस्थित चौकोर लॉन बनाने के लिए पेड़, पौधों और फूलों के एक बड़े हिस्से को हटाने में सफल हुए थे, एक तथाकथित “फ्रेंच गार्डन”. यदि परिणाम शानदार है, तो यह अब परियोजना की उत्पत्ति के अनुरूप नहीं है।

इसके अलावा, ब्रिटिश राज के अंत में, भारतीयों ने मूल उद्यान को फिर से बनाया नहीं था लेकिन केवल लॉन संरक्षित किया था, जिन्हें आज भी देखा जा सकता है।

20 वीं शताब्दी के युद्ध – Taj Mahal Information in Hindi

प्रत्येक देश इस महान देश पर हमला करना चाहता था जो ताजमहल को एक विशेषाधिकार प्राप्त लक्ष्य बनाता है। वे देश को प्रतीकात्मक रूप से घायल करने के लिए, इस स्मारक को नष्ट करने के लिए तैयार थे। यही कारण है कि 20 वीं शताब्दी के दौरान इसे बार-बार कवर किया गया था। पहली बार 1942 में ताज महल के साथ मचान लगाई गयी थी।

विचार यह था कि हवाई दृश्य से इसे छिपाने के लिए गुंबद के चारों ओर लकड़ी की सुरक्षा की जाए, ताकि इसे हमला करने का आसान लक्ष्य न बनाया जा सके। उस समय ताजमहल का दुश्मन लूफ़्टवाफे़ विमान था। युद्ध की समाप्ति से पहले, जापान ने ताजमहल को भी निशाना बनाने की कोशिश की।

भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 1965 और 1971 के बीच अभी भी उनका इस्तेमाल किया गया था। 2001 में इन दोनों पड़ोसी देशों के बीच एक और संकट खड़ा हो गया। ताजमहल की सुरक्षा को और मजबूत किया गया, और इसे हमला करने से रोकने के लिए इसे बड़े खाकी कैनवस के साथ कवर करने का निर्णय लिया गया।

Taj Mahal Today | ताजमहल का आज

आज, एक वर्ष में लगभग 30 लाख लोग (या पर्यटक मौसम के दौरान एक दिन में लगभग 45,000) ताजमहल देखने आते हैं।

आस-पास के कारखानों और ऑटोमोबाइल से वायु प्रदूषण, मकबरे के चमकदार सफेद संगमरमर के अग्रभाग के लिए एक सतत खतरा बन गया है, और 1998 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इमारत को बिगड़ने से बचाने के लिए कई प्रदूषण-विरोधी उपायों का आदेश दिया। कुछ कारखानों को बंद कर दिया गया था, जबकि वाहनों के आवागमन को परिसर के तत्काल आसपास से प्रतिबंधित कर दिया गया था।

ताजमहल पर विवाद

Taj Mahal History in Hindi – ताजमहल का मूल नाम तेजो महालय था, जिसे प्राचीन शिव मंदिर 1155 ईस्वी में बनाया गया था. यह विवाद काफी समय से चल रहा है जिसका अधिक विश्लेषण आप यहाँ पढ़ सकते हैं >>> ताजमहल या तेजो महालय (English) – Mysterious Taj Mahal History in Hindi.

यह भी पढ़ें –

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सच्ची कहानियाँ | Real-life Inspirational Stories in Hindi

ये प्रेरक कहानियां (Inspirational Stories in Hindi) आपको अपने सपनों का पालन करने, दूसरों के साथ दयालुता से पेश आने और खुद को कभी हार न मानने के लिए प्रोत्साहित करेंगी। कहानियां जीवन के यादगार पलों को संवारने और...

ये प्रेरक कहानियां (Inspirational Stories in Hindi) आपको अपने सपनों का पालन करने, दूसरों के साथ दयालुता से पेश आने और खुद को कभी हार न मानने के लिए प्रोत्साहित करेंगी।

कहानियां जीवन के यादगार पलों को संवारने और जीवन के पाठ को समझने का एक अच्छा तरीका हैं।

कहानियां हमेशा छात्रों के लिए एक पसंदीदा होती हैं जो उनके प्यार और रुचि का आह्वान करती हैं। यह एक कारण है कि teachers इसे कई क्षेत्रों में motivate करने के लिए एक tool के रूप में उपयोग करते हैं।

इस लेख में एक अच्छी सीख के साथ कई सामान्य लोक कहानियां शामिल हैं, सफल व्यक्तियों के वास्तविक जीवन के उदाहरण जो उनकी जीवन यात्रा का हिस्सा रही हैं।

यहाँ हम कुछ Short Inspirational Stories in Hindi पर एक नज़र डाल सकते हैं जो छात्रों को कड़ी मेहनत करने और एक सफल जीवन के लिए अपनी नींव रखने में मदद करती हैं।

Real Life Inspirational Stories in Hindi

नैतिक पाठ के साथ ये बहुत छोटी प्रेरणादायक कहानियाँ (प्रेरक कहानियां) छात्रों के लिए एकदम सही हैं!

Inspirational Story #1 – ठोस निर्णय लें

Short Inspirational Stories in hindi
Short Inspirational Stories in Hindi

पाँच वर्ष की अवस्था में बालक गुरुदत्त को पांधे के पास पढ़ने के लिए बैठाया गया। जैसे परिवारों में पुरोहित हैं, वैसे ही पांधे होते थे। लगभग छह मास तक गुरुदत्त अपने पांधे से केवल लुंडी के अक्षरों का ज्ञान ही प्राप्त कर सके, जबकि इसी अवधि में उनका एक मित्र अपने पांधे से पहाड़े भी सीख चुका था।

गुरुदत्त अपने पांधे की पढ़ाई से संतुष्ट नहीं था। अत: घर पर बिना बताए गुरुदत्त अपना पांधा बदल लिया और अपने मित्र के साथ उसके पांधे के पास पढ़ने जाने लगे। गुरुदत्त के पारिवारिक पांधे ने उनके पिताश्री से शिकायत कर दी कि आपका लड़का मेरे पास पढ़ने नहीं आता, तो उसी दिन जब गुरुदत्त पढ़कर आ रहे थे, उनसे पिताजी ने पूछा- “कहां से आ रहे हो?”

“पांधे से पढ़कर।”

“तुम वहां नहीं थे।”

“मैं दूसरे पांधे टकसाल वाले के पास पढ़ने जाता हूं। वह हमारे परिवार के पांधे से अच्छा पढाता है. मैं उनकी कृपा से जमा, बाकी तथा पहाड़े सब सीख गया हूं।”

“कब से जा रहे हो वहां?”

“दो माह से।”

“और उसने नजर (दक्षिणा) नहीं मांगी?”

“मांगी थी।”

“तो कहां से दी?”

मन कहा था कि मैं पिताजी से बिना पूछे पढ़ने आया हूं, जब कुछ सीख जाऊँगा, तब घर से लाकर दूंगा।”

अपने सर्वप्रथम गुरु का चयन स्वयं करने वाले गुरुदत्त आज महान उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। गुरुदत्त ने कितना ठोस निर्णय लिया कि उसने उनकी जिंदगी ही बदल दी। पूत के पांव तो पालने में ही पहचान लिये जाते हैं।

जब गुरुदत्त ने अपने लिए योग्य शिक्षक की स्वयं तलाश कर ली तो घर वालों को तभी आभास हो गया था कि यह लड़का परिवार का नाम एक दिन जरूर गौरवान्वित करेगा. आगे चलकर गुरुदत्त महान् सिद्धांत प्रिय राजनीतिज्ञ और लोकप्रिय उपन्यासकार बने।

गुरुदत्त तो उस समय छोटा बच्चा था. लेकिन आप तो इस समय छोटे बच्चे नहीं हैं, फिर ठोस निर्णय लेने में क्यों विचलित होते हो, अरे भाई इतना ही हो सकता है कि सफलता से पहले एक-दो बार असफलता का मुंह देखना पड़ जायेगा, लेकिन उससे भी तो कुछ न कुछ शिक्षा ही मिलेगी। इसलिए जीवन में यदि सफल होना चाहते हो तो ठोस निर्णय लेकर कदम आगे बढ़ाते जाएं, फिर आपके कदमों को कोई नहीं रोक सकता।


Inspirational Story #2 – देने की प्रवृत्ति

लंदन में एंजेलेना नामक एक विधवा महिला थी। उसकी आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी। उसने एक दिन बड़ी मुश्किल से दो ब्रेड अपने स्कूल में गये हुए अपने बच्चे के लिए जुगाड़ करके रखे और माथे पर हाथ रखकर बैठ गयी-“हाय! मैं कितनी गरीब हूं। बेटे को भरपूर भोजन भी नहीं करा सकती।”

लेकिन तभी अचानक उसके दरवाजे पर एक भिखारी आ गया-“मैडम! चार दिन से भूखा हूं। खाने के लिए कुछ हो तो दे दो, भगवान भला करेगा।”

एंजेलेना अपनी रसोई में गयी और उसने एक ब्रेड उठाया ही था कि उसके मन में ख्याल आया कि उस भूखे भिखारी का पेट एक ब्रेड से तो भरेगा नहीं, अत: उसने दोनों ब्रेड उठाए और भिखारी को देते हुए कहा-“लो बाबा! मेरे पास आपके खाने के लिए केवल इतना ही है।”

इतना कहकर उसे मन में इतना अपार संतोष हुआ कि वह यह भी भूल गयी कि उसने अपने पुत्र को निवाला भिखारी को दे दिया है। लेकिन सच्चाई यही है कि आज के आपाधापी युग में भी ऐसे ही व्यक्ति उन्नति के परम पथ पर आगे बढ़ पाते हैं, जो देने की प्रवृत्ति रखते हैं। इसलिए देने की प्रवृत्ति विकसित करें और लेने का भाव छोड़ दें। आप भली-भांति जानते हैं कि आपके पास जो कुछ है, वह यहीं से लिया है और यहीं पर छोड़कर जाना होगा, फिर व्यर्थ की आपाधापी क्यों?

आप जीत के मार्ग पर आगे बढ़ो, खूब उन्नति करो, लेकिन किसी दूसरे का मार्ग अवरुद्ध करके या किसी के सिर पर अपने पैर रखकर आसमान को छूने की कोशिश मत करो। अपना मार्ग खुद तलाश करो। जो लोग अपना मार्ग खुद तलाश करते हैं, ईश्वर भी उन्हीं की सहायता करता है।


Inspirational Story #3 – प्रेम संतुष्ट करता है

Real-life Inspirational Stories in Hindi
Real-life Inspirational Stories in Hindi

संत च्वांगत्सु तालाब के किनारे बैठकर मछली मार रहा होता है। सम्राट ने अपने मंत्री को भेजा और कहा सुनो, राजा चाहता है कि तुम आओ और प्रधान मंत्री बनो।

च्वांगत्सु बैठा रहा। उसने मछली से आंख भी नहीं हटाई। वह अपने कांटे को पकड़े हुए था। आढ़तियों को भी नहीं देखा। बस इतना कहा – “क्या आपको उस तट पर कछुआ दिखाई देता है? कीचड़ में, कछुआ अपनी पूंछ हिला रहा है, खुद का आनंद ले रहा है। कछुओं का मजा कीचड़ में है। क्या आप उस कछुए को देखते हैं?”

उन्होंने देखा और उन्होंने कहा, हमें कुछ भी समझ में नहीं आया, कछुए के साथ इसका क्या करना है?

तो च्वांगत्सु ने कहा, हमने सुना है कि सम्राट के महल में तीन हजार साल पुराने सोने में एक मृत कछुआ है। उसकी पूजा की जाती है। यह राज्य चिह्न है। मैं आपसे पूछता हूं कि यदि आप इस कछुए से कहेंगे कि महल में चल, तुम सोने में बदल जाओगे; तुम हजारों साल तक पूजे जाओगे; सम्राट तुम्हारे सामने झुकेंगे। तो यह कछुआ वहाँ जाना चाहेगा या अपनी पूंछ को कीचड़ में घुमाना चाहेगा?

उन आढ़तियों ने कहा कि कछुआ पूंछ को कीचड़ में घुमाना पसंद करेगा। मरने में क्या बात है? और सोना में चढ़ाया जाने का सार क्या है?

तो च्वांगत्सु ने कहा, जाओ। सम्राट को बताएं कि हम भी कीचड़ में पूंछ हिलाना पसंद करते हैं। जब कछुआ इतना बुद्धिमान होता है, तो क्या हम उससे ज्यादा मूर्ख होते हैं? हम अपने आनंद में मगन हैं! हमें आपके महलों, आपके सिंहासन, आपकी प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं है।

जो प्यार में खुश है उसे किसी और चीज की जरूरत नहीं है। प्रेम संतुष्ट करता है; दौड़ छूट जाती है। और वह जो महत्वाकांक्षा खो चुका है, उसका मन गिर जाता है। मन महत्वाकांक्षा है। जिसने अपनी महत्वाकांक्षा खो दी है, वह बिना मन के हो जाता है ।

बहुत दौड़ लिए हम सिंहासनों की दौड़ में, बहुत तरह के सोने से ढंके जा चुके हैं। और हर बार स्वर्ण ने कब्र बनाई। अब जागने का समय आ गया है।


Inspirational Story #4 – स्नेहमयी व्यक्तित्व

नार्वे की विख्यात लेखिका सिग्रिड अनसेट को नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था। जिस वक्त उन्हें पुरस्कार दिये जाने की घोषणा की गयी, उनसे भेंट करने के लिए बहुत-से पत्रकार उनके घर जा पहुंचे और अपने आने की सूचना दी।

वह घर के अंदर से निकली और विनम्रता के साथ बोली-“इस समय रात्रि में आप लोगों के यहाँ आने का कारण मैं समझ सकती हूँ। अभी-अभी मुझे भी तार द्वारा नोबेल पुरस्कार दिये जाने की सूचना मिली है, परन्तु खेद है कि मैं इस समय आप लोगों से कोई बात नहीं कर सकती।”

“क्यों भला?” – एक साथ कई पत्रकारों ने कहा।

क्योंकि मैं अपने बच्चे को सुला रही हूँ। यह उनके सोने का समय है। मुझे पुरस्कार पाने की खुशी तो है, पर उससे भी अधिक खुशी मुझे अपने बच्चे के साथ रहने और उनसे बातें करने में मिलती है। इसलिए क्षमा करें और कल सुबह आएँ।”

पत्रकार निराश तो जरूर थे, लेकिन एक माँ की खुशी और स्नेहमयी व्यक्तित्व से अभिभूत भी थे।

सिग्रिड अनसेट की तरह स्नेहमयी बनिये। कहने का मतलब यह है कि जीवन में सफल होने के लिए अपने बंधु-बांधवों को ठुकराना भी ठीक नहीं है। ऐसे कई व्यक्ति होते हैं, जो बड़े-बड़े पद प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन जरा-सी ऊंचाई छूने के बाद वे अपने बूढ़े मां-बाप तक को भी भूल जाते हैं। ऐसे व्यक्ति के सफल होने से भला लाभ ही क्या?


दोस्तों, उम्मीद है कि आप इन Real-life Inspirational Stories in Hindi से कुछ सबक लेंगे और अपने जीवन में लागू करेंगे. हम कामना करते हैं कि आप सफल हो. यहाँ तक पढ़ने के लिए धन्यवाद.

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सीख देने वाली कहानियाँ (13 नैतिक कहानियाँ) –

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  2. चश्मा और एक गाँव वाला
  3. हवा और सूरज
  4. जैसी करनी वैसी भरनी
  5. चतुर बीरबल
  6. अंधी नक़ल बुरी है
  7. दो मेंढक
  8. गाना गाने वाला दरियाई घोडा
  9. चार पत्नियां
  10. लकड़ी का बर्तन
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  12. माणिक चोर
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प्रेरक कहानियाँ – Short Motivational Stories in Hindi

Short Motivational Stories in Hindi कई बार छोटी से छोटी घटना (प्रेरक कहानी) भी हमें बहुत बड़ी सीख दे जाती है। इसलिए आज हम आपके साथ ऐसे ही कुछ घटनाएं या प्रेरक कहानी share कर रहे हैं जो हमें बहुत कुछ अच्छा सीखाने का प्रयास...

Short Motivational Stories in Hindi

कई बार छोटी से छोटी घटना (प्रेरक कहानी) भी हमें बहुत बड़ी सीख दे जाती है। इसलिए आज हम आपके साथ ऐसे ही कुछ घटनाएं या प्रेरक कहानी share कर रहे हैं जो हमें बहुत कुछ अच्छा सीखाने का प्रयास करती हैं।आइये देखते हैं Motivational Stories for Kids in Hindi.

सभी घटनाएं इतिहास से ली गई सच्ची घटनाएं हैं.

Motivational Stories in Hindi

प्रेरक कहानी #1 – समर्पण की भावना

story of bhamti devi in hindi
Prerak Kahani – Story of Bhamti Devi in Hindi

संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान वाचस्पति मिश्र को विवाह हुए छत्तीस वर्ष गुजर गये थे, किन्तु वे यह भी नहीं जानते थे कि उनकी पत्नी कौन है? एक दिन वे ब्रह्मसूत्र के शंकर भाष्य पर टीका लिख रहे थे, किन्तु एक पंक्ति कुछ ढंग से नहीं लिखी जा रही थी। दीपक भी कुछ धुंधला हो चला, शायद ठीक तरह से दिख भी नहीं रहा था। उनकी पत्नी दीपक की लौ बढ़ा रही थी। इतने में वाचस्पति मिश्र की नजर उस पर पड़ी।

उन्होंने पूछा-“तुम कौन हो?”

“मैं आपकी पत्नी हूँ। आज से छत्तीस वर्ष पहले हमारा विवाह हुआ था।”

“तुम्हारे साथ मेरा विवाह हुआ। शास्त्रों का भाष्य करते-करते मैं तो यह बात भूल ही चुका था। छत्तीस वर्ष तुमने मौन रहकर मेरी सेवा की है। हे देवी! तुम्हारे त्याग व उपकार अनंत हैं। अपनी इच्छा बताओ।”

“स्वामी, मेरी कोई इच्छा नहीं है। आपने मानव जाति के कल्याण के लिए अनेक शास्त्रों की टीकाएँ लिखी हैं। मैं आपकी सेवा से कृतकृत्य हूँ।”

“हे देवी! तुम्हारा नाम क्या है?”

“इस दासी को भामती कहते हैं स्वामी।”

“मैं शंकर भाष्य पर जो टीका लिख रहा हूँ, उसका नाम मैं भामती टीका रगा।”

और वे फिर लिखने में व्यस्त हो गये। दोनों में कैसी समर्पण की भावना थी! पति अपने मानव-मात्र के कल्याण के लिए समर्पित था, तो उनके कर्त्तव्य से अभिभूत हो भामती युवा-सुख भूलकर पति की सेवा में लगी रही। यहां कोई कह सकता है कि जिस युग में भामती हुई थी, वह आज से अलग था? आज तो महिलायें पुरुषों के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल रही हैं।

निवेदन:

यह सब ठीक है पति और पत्नी दोनों को बराबर के अधिकार हैं, लेकिन यदि पति परमार्थ के कार्य पर चलता हुआ, घर-गृहस्थी के कर्तव्यों को भी भूल जाता है, तो पत्नी का धर्म हो जाता है कि वह उस पर गुजारा-भत्ता आदि के मुकदमे दायर न करे और कोर्ट-कचहरी के चक्कर न लगाये, बल्कि स्वयं युग के मुताबिक, स्वयं भी कुछ नौकरी आदि कर सकती है। लेकिन यदि पति चालाक, धूर्त और अधर्म के कर्मों में लिप्त है तो ऐसी अवस्था में पत्नी उसे कोर्ट तो क्या, भरी पंचायत में भी घसीट सकती है, फिर उसके साथ हमारी हमदर्दी भी है।


प्रेरक कहानी #2 – संस्कार और धर्म पालन

Motivational Stories in Hindi

prerak kahani - tamil kavi valluvar
Prerak Kahani – Tamil Kavi Valluvar Story

तमिल कवि वल्लुवर की स्त्री का नाम वासुकी था। वह बड़ी ही पतिव्रता थी। विवाह के दिन वल्लुवर ने खाना परोसते समय उससे कहा-“मेरे खाते समय नित्य एक कटोरे में पानी तथा एक सुई रख दिया करो।” वासुकी ने जीवन पर्यन्त पति की इस आज्ञा का पालन किया।

जीवन के अंतिम क्षणों में जब वल्लुवर ने उससे पूछा-“तुम्हें कुछ चाहिए? क्या कोई इच्छा है तुम्हारी?”

“हाँ! एक बात पूछनी है। विवाह के दिन आपने भोजन करते समय नित्य एक कटोरा पानी और एक सुई रखने को कहा था। मैंने आपसे उसका प्रयोजन पूछे बिना ही यह कार्य प्रतिदिन किया। तथापि आज यह जानने की मेरी इच्छा हो रही है कि आप ये दोनों चीजें क्यों मांगा करते थे? यदि बता दें तो मैं शांति से मर सकूं।”

वल्लुवर ने स्नेहपूर्वक उत्तर दिया-“मैंने इसलिए पानी और सूई रखने के लिए कहा था कि यदि चावल के दाने गिर पड़ें, तो उन्हें सूई से उठाकर पानी से धोकर खा सकू, किंतु तुम इतनी दक्ष थीं कि तुमने एक दिन भी सूई और पानी का उपयोग करने का मुझे अवसर ही नहीं दिया।”

वासुकी का यह उद्धरण काल्पनिक नहीं, बल्कि वास्तविक हैं, जिन्होंने सुहागिन होते हुए भी अपने यौवन का त्याग कर दिया, लेकिन जन-कल्याण में लगे हुए अपने माथे के सिंदूर की लाली फीकी न पड़ने दी।

ऊपर पौराणिक उदाहरण दिये गये हैं, लेकिन यदि आप कहेंगे कि हमें संत या कवि नहीं बनना, हम तो कुछ नया करना चाहते हैं. तो भाई हम कहां कहते हैं कि आप कुछ नया न करो! लेकिन इस दुनिया में कुछ नया तो है नहीं। जितने तत्व धरती के निर्माण के समय थे, उतने ही आज हैं। कोई तत्व न तो घटा है और न ही बढ़ा है।

ऊंचाई को छूने की ललक में अपनी मान-मर्यादा, संस्कार और दीन-धर्म को नहीं त्यागा जा सकता है। यदि सफलता के लिए यह सब छोड़ना पड़े तो धिक्कार है ऐसी उन्नति को। इसलिए अपने इतिहास से हमें शिक्षा तो लेनी ही चाहिए।


प्रेरक कहानी #3 – दृढ़ संकल्प शक्ति

prerak kahani - chandra shekhar azad
Prerak Kahani – Short Motivational Stories in Hindi

जिस मनुष्य के भीतर दृढ़ संकल्प शक्ति होती है, वही व्यक्ति अपने भीतर ऊंचा उठने की शक्ति को महसूस करता है। हमें यह न भूलना चाहिए कि यश संकल्प पर आधारित होता है, मनुष्य संकल्प के बलबूते पर ही उन्नति करता है। संकल्प वह चमत्कारी जादू है, जिसे दैनिक जीवन में नियमित रूप से अपनाने से मानव का कायाकल्प हो जाता है।

संकल्प उस अटल निश्चय का नाम है, जिससे मानव सही मार्ग पर चलने के लिए आत्मबल और दृढ़ता चंद्रशेखर आजाद ने मातृभूमि को आजाद कराने का संकल्प लिया था। उन दिनों गाजीपुर के महन्त बीमार थे।

उन्होंने साहित्यकार रामकृष्ण खत्री से कहा-“आपकी निगाह में अगर कोई सुशील, सच्चरित्र लड़का हो तो बताएँ, उसे अपना शिष्य बनाकर इस मठ की व्यवस्था करके उसके सुपुर्द करना चाहता हूँ. “

खत्री जी क्रांतिकारियों के साथ काम कर रहे थे, उन्होंने इसकी चर्चा की तो चंद्रशेखर आजाद भी शिष्य बनने को तैयार हो गये।

खत्री जी ने कहा-“तुम पागल तो नहीं हो? साधु बनोगे? सिर घुटवाना पड़ेगा, दीक्षा लेनी पड़ेगी और सेवा करनी होगी, दिन-रात मठ में तो रहना ही होगा.”

आजाद ने कहा-“मेरे साहित्यकार भाई! मठ में काफी संपत्ति है। हमारी पार्टी को धन की बहुत आवश्यकता है। अगर धन होगा तो पार्टी बहुत मजबूत होगी, पार्टी मजबूत होगी तो देश जल्दी आजाद हो जायेगा। अपने देश को आजाद करवाने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ।”

“तुम्हारा परिचय किस नाम से करवाया जाए?”

“एक कवि के नाम से करवा देना बस।”

“अगर महन्त जी कविता सुनाने के लिए कहने लगे तो?”

“देश की आजादी के लिए मैं क्रांतिकारी बन सकता हूँ, तो क्या कवि नहीं बन सकता? साहित्यकार होकर भी क्या तुम नहीं जानते कि कलम तलवार से भी बड़ा शस्त्र होता है।” कहकर आजाद गंभीर हो गये।

आजाद जैसा दृढ़ संकल्प यदि तुम करोगे तो निश्चय ही सफलता तुम्हारे कदमों को चूमेगी।


प्रेरक कहानी #4 – स्वाभिमान

prerak kahani - premchand shivarani devi story
Prerak Kahani | Premchand – Shivarani Devi Story

एक बार अलवर के राजा ने अपना कहानी-उपन्यास पढ़ने का शौक पूरा करने के लिए प्रेमचंद को चार सौ रुपये मासिक वेतन पर नियुक्ति के लिए बुलाया। साथ ही बंगला और मोटर देने को भी कहा।

प्रेमचंद ने राजा साहब को जवाब लिख भेजा-“क्षमा कीजिए। इतनी ही क्या कम कृपा की। बात यह है कि आप मेरी कहानियाँ और उपन्यास चाव से पढ़ते हैं, मैं इससे बहुत संतुष्ट हूँ।”

प्रेमचंद का स्वाभिमान भला किसी राजा की गुलामी स्वीकार कर सकता था? कदाचित् नहीं, लेकिन कुछ मनोविनोद के लिए उन्होंने अपनी पत्नी शिवरानी से कहा-“मेरी इच्छा है कि चलो, कुछ दिन मोटर-बंगले का शौक तो पूरा कर लूँ। मेरी कमाई में इसकी गुंजाइश नहीं।”

शिवरानी देवी बड़ी समझदार थीं, तुरन्त जवाब दिया-“यह इसी तरह हुआ, जिस तरह कोई कुलवधू अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए कुमार्ग पर चल पड़े। लेकिन जिसने मजदूरी करना अपना उद्देश्य बना लिया हो, उनके लिए मोटर-बंगले की इच्छा कैसी?”


प्रेरक कहानी #5 – कृतज्ञ रहें

भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र अपनी उदारता के कारण लगभग कंगाल हो चुके थे। एक समय ऐसा आया कि जब उनके पास इतने भी पैसे नहीं थे कि आये हुए पत्रों का उत्तर भेज सकें। जो पत्र आते थे, उनके उत्तर लिखकर लिफाफे में बंद कर भारतेंदु जी मेज पर रख देते थे। उन पर टिकट लगाने को पैसे हों तो पत्र भेजे जाएँ। उनकी मेज पर पत्रों की एक ढेरी एकत्र हो गयी थी।

उनके एक मित्र ने उन्हें पाँच रुपये के डाक टिकट लाकर दिये, तब वे लेटर बॉक्स में डाले गये। बाबू जी ने मुसीबतों से हिम्मत नहीं हारी। जिसका परिणाम यह हुआ कि कुछ समय बाद भारतेंदु जी स्थिति थोड़ी ठीक हुई। जब-जब वे मित्र से मिलते थे, तब-तब भारतेंदु जी जबरदस्ती उनकी जेब में पाँच रुपये डाल देते और कहते-“आपको स्मरण नहीं, आपके पाँच रुपये मुझ पर ऋण हैं।”

मित्र ने एक दिन कहा-“मुझे अब आपसे मिलना बंद कर देना पड़ेगा।” भारतेंदु बाबू के नेत्र भर आये। वे बोले-“भाई तुमने मुझे ऐसे समय पाँच रुपये दिये थे कि मैं जीवनभर तुम्हें प्रतिदिन अब पाँच रुपये देता रहूं, तो भी तुम्हारे ऋण से छुट नहीं सकता।”

यह थी कृतज्ञता की पराकाष्ठा। अपने बुरे वक्त को मत भूलिए और बुरे वक्त में जिन लोगों ने आपकी मदद की उन्हें तो बिल्कुल मत भूलिये। ऐसा करना आपके उन्नति मार्ग को प्रशस्त करता है।


प्रेरक कहानी #6 – आशावादी बनें

दरअसल यह कोई कहानी नहीं बल्कि एक छोटा सा प्रसंग है.

एक बार एक कार्यक्रम में किसी साहित्यकार ने आधुनिक मनुष्य की तुलना राक्षस जाति से कर डाली, तो प्रत्युत्तर में प्रख्यात कवयित्री महादेवी वर्मा ने कहा-

“मनुष्य का जीवन इतना एकांगी नहीं है कि उसे हम केवल अर्थ, केवल काम या ऐसी ही किसी एक कसौटी पर परख कर संपूर्ण रूप से खरा या खोटा कह सकें।

कपटी-से-कपटी लुटेरा भी अपने साथियों के साथ कितना सच्चा है, उसे देखकर महान सत्यवादी भी लज्जित हो सकता है। कठोर-से-कठोर अत्याचारी भी अपनी संतान के प्रति इतना कोमल है कि कोई भी भावुक उसकी तुलना में नहीं ठहरेगा.

बार-बार नदी में डुबकी लगाने वाला मकोड़ा भी हर बार पत्ते पर शरण लेने के लिए संघर्ष करता रहता है, वह अपनी आशा को सफलता पाने या मृत्यु तक नहीं तजता।”

सच पूछिए तो आशा और आत्मविश्वास ही वे वस्तुएं हैं, जो हमारी आत्मिक शक्तियों को जगाती हैं और सृजनात्मक शक्ति को बढ़ाती हैं। आशा के अभाव में सारा संसार ही निराशामय दिखायी पड़ता है।


दोस्तों, उम्मीद है आपको ये Short Motivational Stories in Hindi पसंद आई होंगी और आप इनसे कुछ सीख लेंगे. हम आपकी सफलता की कामना करते हैं. पढ़ने के लिए धन्यवाद.

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ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रेरक प्रसंग (2 प्रसंग)

  1. स्वावलम्बन
  2. एक पैसा

Real-life Inspirational Stories in Hindi (4 सच्ची प्रेरक कहानियाँ)

  1. ठोस निर्णय लें – (गुरुदत्त – राजनीतिज्ञ और लोकप्रिय उपन्यासकार)
  2. देने की प्रवृत्ति – (एंजेलेना, एक विधवा महिला की कहानी)
  3. प्रेम संतुष्ट करता है – (सन्त च्वांगत्सु)
  4. स्नेहमयी व्यक्तित्व – (नार्वे की विख्यात लेखिका सिग्रिड अनसेट)

लघु प्रेरक प्रसंग कहानियाँ  (10 कहानियाँ) –

  1. अडिगता पर एक बच्ची का प्रसंग
  2. हस्तरेखा – (राजा वसुसेना)
  3. घमंड मत करो (सन्त च्वांगत्सु)
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  5. राजा मणीन्द्र चन्द्र नन्छी
  6. देवी लक्ष्मी vs दरिद्र देवी
  7. सात्विक आहार (साहित्यकार संतराम)
  8. मीठा बोलें (आचार्य विनोबाजी)
  9. उचित विश्राम (मिर्जा गालिब)
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  1. एकलव्य की कहानी का रहस्य – भक्ति और निष्ठा से सीखें
  2. प्रेरक प्रसंग – सुखों को बांटना सीखो
  3. युद्धिष्ठिर का स्वर्ग प्रस्थान | धर्म-पालन करें
  4. उठो जागो – एक सीख देने वाली वैदिक कहानी

Hindi Prerak Kahaniyan (बच्चों की 8 कहानियाँ)

  1. मुन्ना हुदहुद की जूती
  2. तैंतीस गधे
  3. गहनों का पेड़
  4. अब काहे के सौ
  5. सोने का निवाला
  6. जादुई फिरन
  7. मेवे की खीर
  8. सुनहरी तितली

13 नैतिक प्रेरक कहानियाँ यहाँ पढ़ें >>> सीख देने वाली कहानियाँ 

  1. अपनी आँखें खुली रखो
  2. चश्मा और एक गाँव वाला
  3. हवा और सूरज
  4. जैसी करनी वैसी भरनी
  5. चतुर बीरबल
  6. अंधी नक़ल बुरी है
  7. दो मेंढक
  8. गाना गाने वाला दरियाई घोडा
  9. चार पत्नियां
  10. लकड़ी का बर्तन
  11. सफेद गुलाब
  12. माणिक चोर
  13. पंखे वाली मछली

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प्रेरक प्रसंग – सुखों को बांटना सीखो

अपने सुखों का वितरण करने में इस दुनिया में सबसे अधिक नाम यदि किसी ने कमाया है, तो वह हैं महाभारतकालीन कर्ण। कर्ण ‘दानवीर’ के नाम से जाना जाता था। सभी कर्ण के दानी स्वभाव की बड़ी प्रशंसा करते...

अपने सुखों का वितरण करने में इस दुनिया में सबसे अधिक नाम यदि किसी ने कमाया है, तो वह हैं महाभारतकालीन कर्ण। कर्ण ‘दानवीर’ के नाम से जाना जाता था। सभी कर्ण के दानी स्वभाव की बड़ी प्रशंसा करते थे। लेकिन कर्ण की इस प्रशंसा से अर्जुन हमेशा चिढ़ा करते थे।

एक बार जब भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे, तब बातचीत में अर्जुन ने कृष्ण को पूछा कि क्यों कर्ण को दानवीर कहा जाता है, उन्हें नहीं। जबकि हम भी तो बहुत दान करते हैं।

अर्जुन का दान

एक दिन कृष्ण ने कर्ण और अर्जुन के दान की परीक्षा लेने का निश्चय किया उन्होंने अपनी माया से एक सोने का पहाड़ बनाया और पहले अर्जुन से कहा-“सूरज डूबने से पहले उसे सारा पहाड़ दान कर देना है।”

अर्जुन ने तुरन्त पहाड़ काटकर उसे बांटना शुरू कर दिया। दो दिनों और दो रातों के लिए, अर्जुन ने सोने के पहाड़ को खोदा और गाँव में सोने का वितरण किया।

इस बीच कई ग्रामीण फिर से कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करने लगे। अर्जुन अब थक गया था लेकिन अपना अहंकार नहीं छोड़ रहा था।

अर्जुन सुबह से शाम तक बिना कुछ खाये-पिये, बिना रुके पहाड़ काटता रहा, पर शाम तक सिर्फ कुछ ही पहाड़ काट सका। पहाड़ पर कोई असर नहीं पड़ा। शाम को उसने अपनी हार मान ली।

कर्ण का दान

दूसरे दिन कृष्ण ने फिर वैसा ही पहाड़ बनाया और कर्ण से उसे बांटने को कहा। कर्ण को पहाड़ बांटने का काम सौंप कर श्रीकृष्ण और अर्जुन वापस लौट रहे थे। अभी उन्होंने आधा रास्ता भी तय नहीं किया था कि पीछे से तेजी से एक रथ आता दिखाई दिया। रथ कर्ण का था।

कर्ण को वापस आता देख अर्जुन को बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि वह पूरे दिन काम करके भी पूरा पहाड़ काटकर दान नहीं कर पाया था।

कर्ण ने पास आकर श्रीकृष्ण से कहा-“भगवन्! मैंने अपना काम पूरा कर दिया है।”

अर्जुन को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने कर्ण से पूछा कि यह कैसे संभव हुआ। तब कर्ण ने जवाब दिया-“मैंने आस-पास के सभी गांव वालों को बुलवाकर उनसे कहा कि जो जितना सोना चाहे, पहाड़ तोड़कर ले जाये। इतना कहना था कि सारे गांव वाले पहाड़ तोड़ने में जुट गये और थोड़ी ही देर में सारे पहाड़ के छोटे-छोटे टुकड़े हो गये।”

तब कृष्ण ने अर्जुन से कहा-“देखा पहाड़ तो तुम भी दान करना चाहते थे, पर तुम्हें यह नहीं सूझा।”

कृष्ण मुस्कुराए और अर्जुन से कहा कि तुम सोने से मोहित हो गए थे और तुम ग्रामीणों को उतना सोना दे रहे थे जितना तुमने सोचा था कि उन्हें जरूरत है।

लेकिन कर्ण ने इस तरह नहीं सोचा और दान देने के बाद कर्ण वहां से चला गया। वे नहीं चाहते थे कि कोई इस बात पर उनकी प्रशंसा करे, न ही उन्हें इस बात का बुरा लगा कि कोई उनके पीछे क्या बोलेगा।

यह एक ऐसे व्यक्ति का संकेत है जिसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है। एक दान के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना एक उपहार देना नहीं है बल्कि यह सौदा होता है।

इसलिए, यदि हम किसी को कुछ दान या समर्थन देना चाहते हैं, तो हमें इसे बिना किसी उम्मीद या आशा के करना चाहिए ताकि यह हमारे अच्छे कर्म हों, हमारा अहंकार न हो।


कहानी से सीख -Moral of the Story

आप लोग कर्ण वाली सोच रखें, अर्जुन वाली नहीं। अर्जुन भले ही अपने युग का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर रहा हो, लेकिन क्या वह एकलव्य से बढ़कर धनुर्धर हो सकता है? क्या उसका यश और कीर्ति कर्ण जैसा हो सकती है, कदाचित नहीं। कर्ण ने भले ही अधर्म के पथ पर चलने वाले दुर्योधन का साथ दिया हो, लेकिन उसने अपने व्यक्तिगत मामलों में धर्म के दस नियमों का पालन किया था। इसीलिए तो आज श्रद्धा के साथ उसको याद किया जाता है।

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युद्धिष्ठिर का स्वर्ग प्रस्थान | धर्म-पालन करें

कहते हैं कि जिसकी भार्या सतवंती हो, उसने समझो दुनिया का तीसरा सुख प्राप्त कर लिया। कहने को तो आज सभी नारियां सतवंती और सभी पुरुष राम होने का दावा करते हैं। लेकिन अपने गिरेबां में झांके और अपने...

कहते हैं कि जिसकी भार्या सतवंती हो, उसने समझो दुनिया का तीसरा सुख प्राप्त कर लिया। कहने को तो आज सभी नारियां सतवंती और सभी पुरुष राम होने का दावा करते हैं। लेकिन अपने गिरेबां में झांके और अपने दुर्गुणों का में त्याग कर दें। इस संबंध महाभारत का एक प्रेरक प्रसंग बड़ा उपयुक्त जान पड़ता है, जो इस प्रकार है-

प्रेरक प्रसंग – धर्म-पालन करें

महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने। वह एक आदर्श राजा बने। राज्य में सभी अपने राजा से बहुत खुश थे। युधिष्ठिर को राज्य संभलवा कर महाराज धृतराष्ट्र अपनी पत्नी गांधारी और पांडवों की माता कुन्ती के साथ हिमालय पर चले गये थे।

कई वर्षों बाद एक दिन नारद मुनि युधिष्ठिर के पास एक दु:खद समाचार लेकर आये। नारद मुनि ने बताया कि हिमालय के एक वन में आग लगने से उनकी माता कुन्ती और महाराज धृतराष्ट्र, महारानी गांधारी जल कर भस्म हो गये हैं। इस खबर से सारे पांडव शोक में डूबे हुए थे।

इतने में उन्हें एक और दु:खद समाचार मिला कि श्री कृष्ण की भी मृत्यु हो गयी है।

इन समाचारों को सुनकर युधिष्ठिर का मन सांसारिक कामों से बिल्कुल हट गया और उन्होंने संसार छोड़ने का निश्चय कर लिया। बड़े भाई को सब छोड़ते देख सारे पांडव और उनकी पत्नी द्रौपदी भी संसार छोड़ने को तैयार हो गयीं।

युधिष्ठिर ने अपना राज्य अभिमन्यु के बेटे परीक्षित को सौंप दिया और भाइयों तथा पत्नी के साथ हस्तिनापुर छोड़ दिया सारे नगरवासी अपने प्रिय राजा को नगर सीमा तक छोड़ने आये। इसी भीड़ में एक कुत्ता भी उनके साथ पीछे-पीछे चलने लगा। चलते-चलते उन्होंने अनेक जंगल पार किये। एक पर्वत पर जब वह चढ़ रहे थे, तब अचानक द्रौपदी का पैर फिसल गया और वह नीचे खाई में गिर गयी।

भीम ने अपने बड़े भाई से द्रौपदी के गिरने का कारण पूछा। युधिष्ठिर ने कहा-“वह हमारे साथ सदेह स्वर्ग नहीं जा सकती, क्योंकि वह हमेशा अर्जुन से पक्षपात करती थी, उसी को सबसे ज्यादा चाहती थी माताश्री की आज्ञा से उसने पांचों पांडवों की भाया बनना स्वीकार किया था, लेकिन अपने धर्म को वह भली-भांति निभा नहीं सकी।”

थोड़ी देर बाद सहदेव गिर पड़ा, इस पर युधिष्ठिर ने जवाब दिया कि वह विनम्र नहीं था, इसलिए गिर गया, फिर नकुल गिरा क्योंकि उसे अपनी सुंदरता पर घमण्ड था। फिर अर्जुन गिरे। अर्जुन के गिरने का कारण युधिष्ठिर ने बताया कि उसे अपने शौर्य पर बहत घमंड होने लगा था।

फिर भीम  गिरने लगे, तब युधिष्ठिर ने कहा कि तुम बहुत लालची थे और हमेशा खाते रहते थे, इसलिए तुम भी सदेह स्वर्ग नहीं जा सकते। अब सिर्फ युधिष्ठिर अकेले रह गये थे और उनके साथ था वह कुत्ता जो हस्तिनापुर से उनके साथ चला आ रहा था।

रथ आगमन

थोड़ी चलने पर उन्हें आकाश मार्ग से एक रथ उनके पास आता दिखाई दूर दिया। स्वर्ग के राजा इन्द्र स्वयं युधिष्ठिर को सदेह स्वर्ग में ले जाने के लिए अपना रथ लेकर आये थे।

पास आकर इन्द्र ने युधिष्ठिर को साथ चलने को कहा। पर युधिष्ठिर ने कहा कि अपने भाइयों और पत्नी बगैर उन्हें स्वर्ग जाने की कोई इच्छा नहीं है। तब इन्द्र ने उन्हें बताया कि वह भी स्वर्ग पहुंचेंगे, पर अपनी देह के साथ नहीं। हर समय धर्म का आचरण करने के कारण सिर्फ युधिष्ठिर ही सदेह स्वर्ग जा पायेंगे। उनकी बात सुनकर युधिष्ठिर इन्द्र के साथ चलने को तैयार हो गये पर उनकी एक शर्त थी कि उनके साथ वह कुत्ता भी चलेगा।

इन्द्र ने युधिष्ठिर को समझाया कि स्वर्ग में पशुओं के लिए कोई जगह नहीं है। पर युधिष्ठिर कुत्ते को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे. इन्द्र ने उन्हें बहुत समझाया कि आखिर तुमने अपने भाइयों और पत्नी को भी छोड़ दिया। युधिष्ठिर ने जवाब दिया कि वे सब तो मर गये, पर यह तो जीवित है और इतनी दूर से मेरे साथ चल रहा है, मैं इसे नहीं छोड़ सकता।

युधिष्ठिर का इतना कहना था कि कुत्ते की जगह स्वयं यमराज वहाँ प्रकट हो गये। असल में यमराज ही अपने बेटे की परीक्षा ले रहे थे यमराज ने कहा–” बेटा तुम सभी प्राणियों के प्रति दया रखते हो, इसलिए केवल तुम सशरीर स्वर्ग में प्रवेश कर सकते हो।” यह कहकर यमराज अपनी नगरी चले गये और इन्द्रदेव युधिष्ठिर को अपने रथ पर बैठाकर स्वर्ग की ओर चल पड़े।


कहानी से सीख | Moral of the Story

यह कथा भले ही पौराणिक हो, लेकिन इससे एक साथ कितनी शिक्षा मिलती है, इस पर ध्यान देना चाहिए। पत्नी पतिव्रता का धर्म निभाए और पति पतिव्रता का धर्म निभाए साथ ही साथ किसी को भी अपनी उपलब्धियों पर घमण्ड नहीं होना चाहिए। स्वर्ग का मतलब सुख-समृद्धि को पाने के अलावा और कोई नहीं, इसलिए यदि तुम सुख-समृद्धि पाना चाहते हो तो धर्म के मार्ग का अनुसरण करो।

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Eklavya Story in Hindi – भक्ति और निष्ठा से सीखें

एकलव्य की कहानी | Eklavya Story in Hindi एकलव्य निषादराज (एक गरीब शिकारी) का बड़ा ही होनहार बेटा था। वह जंगल में हिरणों को बचाने के लिए तीरंदाजी सीखना चाहता था जो तेंदुए द्वारा शिकार किए जा रहे थे। बचपन से...

एकलव्य की कहानी | Eklavya Story in Hindi

एकलव्य निषादराज (एक गरीब शिकारी) का बड़ा ही होनहार बेटा था। वह जंगल में हिरणों को बचाने के लिए तीरंदाजी सीखना चाहता था जो तेंदुए द्वारा शिकार किए जा रहे थे। बचपन से उसे धनुष चलाने का शौक था। जैसे-जैसे एकलव्य बड़ा होता गया, उसके मन में धनुर्विद्या सीखने की इच्छा और प्रबल होती गयी।

उन दिनों गुरु द्रोण पांडवों और कौरवों को धनुर्विद्या सिखा रहे थे। द्रोणाचार्य शाही परिवार के शिक्षक थे। गुरु द्रोण की ख्याति चारों ओर फैली हुई थी। उनके जैसा धनुर्धर कोई नहीं था। एकलव्य ने भी गुरु द्रोण से धनुर्विद्या सीखने का निश्चय किया।

वह हस्तिनापुर गुरु द्रोण के आश्रम में पहुँचा। आश्रम में गुरु द्रोण ने जब एकलव्य को बाण चलाते देखा, तब वे एकलव्य की प्रतिभा जान गये। वह जान गये कि यह लड़का तीर चलाने में पांडवों और कौरव राजकुमारों से कहीं ज्यादा अच्छा है। उनका प्रिय शिष्य अर्जुन किसी से पीछे रहे यह उन्हें बिल्कुल मंजूर नहीं था। इसलिए गुरु द्रोण ने एकलव्य को यह कह धनुर्विद्या सिखाने से इंकार कर दिया कि वह क्षत्रिय नहीं है।

एकलव्य बेचारा बड़ा निराश होकर जंगल वापस चला गया। वापस आकर भी एकलव्य का हौसला खत्म नहीं हुआ। उसने जंगल में ही गुरु द्रोण की एक प्रतिमा बनाई और रोज उस प्रतिमा के सामने धनुष चलाने का अभ्यास करने लगा।

एकलव्य का पराक्रम

कुछ दिनों बाद गुरु द्रोण अपने शिष्यों को धनुर्विद्या का अभ्यास करवाने जंगल आये। एकलव्य ने उन्हें जंगल में देख लिया। जंगल में गुरु द्रोण जब अपने शिष्यों को अभ्यास करवा रहे थे, तभी वहीं पास खड़े होकर एक कुत्ते ने भौंकना शुरू कर दिया। इस शोर से गुरु को अपना पाठ पढ़ाने में परेशानी होने लगी।

एकलव्य ने जब अपने गुरु को परेशान होते देखा तो अपनी कमान उठाकर तीरों से उस कुत्ते का मुंह बंद कर दिया। इधर गुरु भी अभी सोच ही रहे थे कि कुत्ते को कैसे चुप कराया जाए। जब वह कुत्ते के पास पहुँचे तो उन्होंने देखा कि कुत्ते का मुंह किसी ने बाणों से इस तरह बंद कर दिया है कि उसके मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही थी। बाण इतनी कुशलता से चलाये गये थे कि कुत्ते को जरा भी चोट नहीं लगी थी।

एकलव्य की कहानी - eklavya story in hindi
एकलव्य की कहानी – Eklavya Story in Hindi

गुरु इतने कुशल धनुर्धर को देखने जब और आगे बढ़े तो सामने एकलव्य था। एकलव्य ने आगे बढ़कर अपने गुरु को प्रणाम किया गुरु ने भी उसे आशीर्वाद देते हुए पूछा कि ऐसी विद्या उसने कहाँ से पायी है। एकलव्य फौरन अपने गुरु को उस जगह ले गया, जहाँ उसने अपने गुरु की प्रतिमा बना रखी थी। और उसने अपने गुरु को बताया कि एकलव्य सिर्फ उन्हीं को गुरु मानता है।

गुरु दक्षिणा

एकलव्य की लगन और निष्ठा देखकर गुरु द्रोण बड़े खुश हुए। पर वह यह नहीं चाहते थे कि कोई भी उनके शिष्य अर्जुन से ज्यादा प्रवीण हो। गुरु ने कुछ सोचकर एकलव्य से कहा-“अगर तुमने मुझे अपना गुरु माना है तो गुरु दक्षिणा भी देनी पड़ेगी।”

एकलव्य अपने गुरु की बात सुनकर बड़ा खुश हुआ। उसने फौरन कहा-“गुरुदेव आप मांग कर तो देखें, आप अगर मेरी जान भी मांगोगे तो मैं हँसते-हँसते दे दूंगा।”

गुरु द्रोण ने दक्षिणा में दाएं हाथ का अंगूठा मांगा। एकलव्य यह बात अच्छी तरह जानता था कि अगर वह अपने दाहिने हाथ का अंगूठा गुरु को दे देगा, तब वह जिन्दगी भर बाण नहीं चला पायेगा। लेकिन एकलव्य अपने गुरु का बहुत आदर करता था और उसी क्षण उसने अपना दायां अंगूठा काटकर गुरु के चरणों में रख दिया।

एकलव्य जानता था कि अंगूठा अर्पण करने बाद वह धनुष-बाण नहीं चला सकता, लेकिन उसने गुरु दक्षिणा दी और फिर उसके बाद उसने पैरों से धनुष-बाण चलाने का अभ्यास किया। कहते हैं कि वह पैरों से धनुष-बाण चलाने में इतना पारंगत हो गया था कि अर्जुन फिर भी उसके आगे नहीं टिक सका था।

यह सत्य है कि आज वह युग नहीं है और न ही एकलव्य जैसे छात्र। लेकिन एकलव्य के शतांश (100) नहीं, यदि दशांश (10) गुण भी धारण कर लिये तो भी जीवन में सफल होने से आपको कोई नहीं रोक नहीं सकता।


इस कहानी में, द्रोणाचार्य को आमतौर पर क्रूर और आत्म-केंद्रित के रूप में देखा जाता है। कथित समझ यह है, यह लड़का जिसने अपने दम पर हुनर ​​सीखा है और वह अच्छा है, उसे द्रोणाचार्य के निहित स्वार्थ के लिए छोड़ दिया जाता है। लेकिन जब कोई इसे बुद्धिमानों के दृष्टिकोण से देखता है, तो वह पाता है, अगर यह इस घटना में सम्मिलित नहीं होता, तो आज कोई भी एकलव्य को नहीं जानता होता।

द्रोणाचार्य ने अंगूठे के लिए पूछकर एकलव्य को एक तरह से अमरता का आशीर्वाद दिया था। इसलिए जब लोग भक्ति के बारे में सोचते हैं, तो वे एकलव्य के बारे में सोचते हैं, न कि अर्जुन के बारे में।

कहानी से सीख – Moral of the Story

द्रोणाचार्य की महानता देखें, उन्होंने उस पर दोषारोपण किया और अपने शिष्य का उत्थान किया। इसीलिए, भले ही गुरु गलत हो, अगर आपकी भक्ति है तो आप कभी गलत नहीं हो सकते। लेकिन गुरु गलत नहीं है, ऐसा लगता है कि वह गलत था लेकिन उसने एकलव्य का उत्थान किया और अपने धर्म (कर्तव्य) को भी संरक्षित किया। उनका कर्तव्य भूमि के कानून को बनाए रखना था: “आपके पास राजकुमार से बेहतर कोई नहीं हो सकता है।”

दोस्तों उम्मीद है आप इस एकलव्य की कहानी (Eklavya Story in Hindi) से कुछ सीख लेंगे और जीवन में आगे बढ़ेंगे.

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